Monday, July 24, 2017

इंसानी चौंगा








               इंसानी चौंगा 

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दुनिया के रचियता ने सबसे बुद्धिमान प्राणी को रचा जिसमें प्रेम, दया,परोपकार, बुद्धि, विवेक, सोचने -समझने की शक्ति व मुस्कुरा के सभी के हृदय को जीतने की शक्ति और सहानुभूति और प्रार्थना स्वरों से किसी पीड़ित को नवजीवन देने की अपार शक्ति निहित थी | जिसमें सपनों और कल्पनाओं को साकार रूप देने की अनंत ऊर्जा विद्दमान थी जोकि दुनिया के रचियता की सबसे भरोसेमन्द और प्रिय रचना थी जिसे उसने नाम दिया "इंसान" | दुनिया के रचियता को पूरा विश्वास था कि यह प्राणी हमारा सहयोगी साबित होगा | यह प्राणी हमारी प्रकृति और हमारी अनंत रचनाओं का रक्षक होगा | दुनिया के रचियता ने उसे समझाया तुम्हारा होना, तुम्हारा कर्म प्रकृति के सभी जीवों की रक्षा और मेरी सभी रचनाओं का सेवाभाव से सम्मान करते हुये जीवन पथ पर सच्चाई और ईमानदारी से अग्रसर होना है तभी तुम्हारा इंसान होना और मेरा तुम्हें रचना सफल और सार्थक होगा | मैं अपनी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी, इंसान को एक अदभुद प्रतिभा और ऊर्जा के साथ भेजता हूँ | मैं किसी को खाली हाथ नही भेजता और नही चाहता कि मेरा इंसान मेरे पास खाली हाथ मिटा हुआ ना लौटे | उसे रक्षक बनाकर भेजा वह भक्षक बन कर न लौटे| उसे देकर भेजा वह छीन कर न लौटे | उसे गर्व से भेजा वह शर्मिंदा होकर न लौटे | वह इंसान है इंसान बन के तो लौटे | इंसान ने पूछा कि हे !  प्रभु इस दुनिया में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कीमती क्या है ? दुनिया के रचियता ने कहा," जीवन |" जीवन की रक्षा करना तुम्हारा प्रथम कर्म और धर्म है, इस सुकर्म को ही इंसानियत कहते हैं |" इंसान ने पूछा यह सब भले कार्यों में मेरा सबसे बड़ा सहयोगी कौन होगा प्रभु? 
दुनिया के रचियता ने कहा," इंसान |" 
इंसान ने कहा," मतलब ? दुनिया के रचियता ने समझाते हुये कहा," हाँ, इंसान ! वह सर्वगुण सम्पन्न सुन्दर सहयोगी शक्ति होगी "नारी" | इंसान, इंसान का सहयोगी हो तो वह और भी उन्नत हो सकेगा | आपसी सहयोग भी एक योग है और जहां सेवा और सहयोग होगा वहां उन्नत मानसिकता, उन्नत भविष्य और एक उन्नत युग का आरम्भ होता है और उन्नत इंसान की शक्ति की कोई सीमा नही होती | वह अनंत अच्चुयत्तम् अद्वैत को भी जान सकता है  | इंसान ही एक मात्र वो अदभुद रचना है जो निस्वार्थ सेवा और प्रेम से निश्चल मुस्कॉन से अपने सुकर्मों से दुनिया के रचियता का साक्षात्कार कर सकती है | पर, अगर इंसान ने इंसानियत को शर्मशार किया तो वह इसका भयंकर दण्ड़ भोगेगा क्योंकि मेरा न्याय यही है कि तुम जो दोगे वही पाओगे | इंसान यह सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने वादा किया कि हम इंसानियत धर्म निभायेगें | दुनिया के रचियता ने प्रेम से समझाया कि वह धरती पर जाकर हर तरह की अति से बचे और हर तरह के लालच से बचे | सदा मुझ पर श्रद्धा रखें और खुद पर भरोसा रखें | इंसान सदा यह याद रखे कि वह इंसान है जिसके ऊपर जीवन मूल्यों को जिंदा रखने की और प्रकृति के रक्षक होने की जिम्मेदारी है जिसे उसे ईमानदारी से इंसानियत के दायरे में रहकर निभानी है | इंसान को सदैव इस बात का स्मरण रहे कि जीवन और  मृत्यु मेरे हाथ में है और उसे अंत में वापस मेरे पास ही लौटना है और जब मेरे पास ही आना है तो हे ! मेरे हृयांश तुम पापी बनकर मत लौटना कि तुम इंसान बने ही लौटना, पशु बनकर मत लौटना | मैं तो एक रचियता हूँ और मैं हमेशा इंसान रचता रहूंगा इस भरोसे से कि कोई तो इंसान, खुद को याद रखे लौट सके और इंसानियत को समेटे, इंसानियत को जिये हुये, कोई इंसान मुस्कुराते हुये मेरे पास लौटे | समय बीता समय बदला इंसान जमाने की चकाचौंध में इस कदर अंधा हुआ कि वह सबकुछ भूल गया और वह धन और रूतवे में तो बहुत ऊँचा उठा पर इंसानियत से लुढ़क कर पशुता पर जा गिरा | उसने अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु प्रकृति को पूरी तरह रौंद डाला है | उसने जंगल काट डाले जिससे कई औषधीय पेड़ -पौधे फूल तथा जीव - जन्तुओं और पक्षियों की अनगिनित उन्नत प्रजातियां लुप्त हो गयीं | उसने निजस्वार्थ में  प्रकृति का सीमा से ज्यादा दोहन किया जिससे प्रकृति में बहुत बड़ा असुंतलन हुआ और इसी असंतुलन का दुष्परिणाम कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा व भयंकर गर्मी व रूह कपांती शर्दी  के रूप में सम्पूर्ण मानवजाति को भुगतना पड़ रहा है | यह इंसान के आधुनिकीकरण की अति का नतीजा है कि वह  प्राकृतिक पत्तल व धातु के बर्तनों को छोड़कर वह प्लास्टिक व पशु हड्डियों से बने बर्तनों में खाना खा रहा, दूध -छांछ की जगह बियर चल रही, सोफ्टड्रिंक चल रहा, कई दिनों के सड़े मैदा के पकवान साथ में धुंआ उड़ाने में अपनी शान समझ रहा | जिसके परिणामस्वरूप वह भयंकर बीमारियों का शिकार हो रहा है | इंसान की धन की भूख इतनी बढ़ी की सामान के आयात - निर्यात के बजाय वह इंसान का ही आयात- निर्यात करने में लगा, इंसान का अंग -अंग बेच कर यह मालामाल हो रहे और सरकार और पुलिस को चुनौती दे रहे | यह भितरघाती हमारे युवाओं को प्रेमजाल में फांस कर उन्हें नशीली दवाओं का आदी बनाकर हमारे देश के भविष्य को कमजोर कर रहे | यह भितरघाती समाज और देश के गद्दारों को समाज के सामने जलील करके फांसी दे देनी चाहिये जिससे जुर्म करने वालों की जुर्म सोचने से पहले रूह कांप जाये | पापियों को जबतक भय नही होगा तब तक यह पापी इंसान सुधरने वाले नही है| इंसान के लालच ने इंसान को हैवान बना
डाला | इंसान ने अपनी बर्बादी की कहानी स्वंय लिखी | उसने केवल और केवल पाना, हड़पना, छीनना ही सीखा वह 'देना' शब्द ही भूल गया | उसकी देने की प्रवत्ति ही खत्म हो चली है जोकि भविष्य में  एक बहुत बड़ी त्रासदी को जन्म देगी और उसके परिणाम बेहद दुखदायी सिद्ध होगें |उसकी सबकुछ पाने की अंधी होड़ चालाक दौड़ ने उसने अपनी सहयोगीशक्ति नारी को भी हद के पार जाकर रूलाया | जन्म देने वाले माँ -बाप को बृद्धाआश्रम छोड़ आता | जिस गाय का दूध पीकर जिंदगी चली उसी गौ माता को काट कर खा जाता |उसने तो दैत्यों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया जो अपनी ही दुधमुंही बच्चियों के साथ बलात्कार कर रहा | अपने कार्यक्षेत्र में गद्दारी कर रहा, अपने कार्यक्षेत्र में अपने सहकर्मियों को सता रहा उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नही छोड़ रहा, अपने कार्यक्षेत्र में अपने नीचे काम करने वाले जूनियर का मनमाना आर्थिक, मानसिक, शारीरिक शोषण कर रहा | इंसान की फितरत ही चोरी और कपटीपन की धोका देने वाले बन चुकी है कि वह अनाज का व्यापार कर रहा तो उसमें मिलावट कर रहा, घी में रिफाइण्ड मिला रहा,तेल में कैमिकल मिला रहा, दूध में पानी और कैमिकल मिला रहा, फलों और सब्जियों में इंजेक्शन लगा रहा,यहाँ पर भी नही रूकता कि ग्राहक से पैसे तो सही चीज के ले रहा पर उन्हें बातों में लगा कर तीन फल में गो फल सडे चढा रहा, जूस में रंग मिला रहा, मिठाइयों में मावा की जगह कैमिकल दे रहा, उसे नही पता कि उसका यह कपटी स्वभाव हजारों मासूम लोगों की जान ले रहा | इंसान खाने-पीने की दुकानों पर यमराज बना बैठा है| वह हर पल लोगों को काल के मुंह में धकेल रहा है | वह हर पल गलतफहमी में है कि वह सामने वाले को लूट रहा पर सच तो यह है कि वह स्वंय को स्वअस्तित्व को, अपने ईमान, अपने जमीर को, इंसान तत्व को इंसानियत को लूट रहा है | इंसान आधुनिक तो बहुत हुआ पर दिमाग से अंधविश्वास नही मिटता कि धन के लालच में अाज भी अपने बच्चों की परिवारीजनों की बलि चढ़ा रहा | नर और नारी दोनों ने अपनी सबकुछ पा जाने की हवस ने इंसानियत को शर्मसार कर
रखा है | इंसान की इस विभाजनकारी विध्वंशकारी मानसिकता ने समस्त
जीवन मूल्यों और रिश्तों को अपने स्वार्थ और लालच व हवस की अाग में भस्म कर दिया है | इस राख में अगर कुछ बचा है तो बस झूठा दिखावा, इंसान का खोखलापन और मात्र "इंसानी चौंगा" जोकि बिल्कुल व्यर्थ है जिसका कोई मूल्य नही है | यह है मूल्यहीन जीवन और इस मूल्यहीन जीवन का दुनिया के रचियता को कोई इंतजार नही | प्रतिपल बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला पर नही बदला तो दुनिया के रचियता का इरादा कि वह आज भी इंसान रच रहा है और धरती की तरफ देख रहा इस भरोसे के साथ कि मेरा भेजा गया इंसान, "इंसान" बने लौटे ना कि इंसानी चौगें पहने |
               



 आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'
http://akaksha11.blogspot.com

Sunday, July 23, 2017

बदहाली ?




बदलाव के बाद भी बदहाल है नारी ?

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सबकुछ बदला पर सोच नही
सबकुछ पाया पर प्रेम नही

सबकुछ मांगा पर बेटी नही
सबकुछ दिया पर सम्मान नही

सबकुछ हारा पर अहंकार नही
सबकुछ जीता पर हृदय नही

सबकुछ जागा पर आत्म नही
सबकुछ प्यारा पर स्वप्न नही

सबकुछ छीना पर दर्द  नही
सबकुछ  मिला पर हमदर्द नही

सबकुछ समझा पर इंसान नही
सबकुछ मिटा पर अस्तित्व नही
सबकुछ छूटा पर रूढ़िवाद  नही
सबकुछ थमा पर अत्याचार नही

सबकुछ देखा पर सबूत नही
सबकुछ मेरा पर वजूद नही

सबकुछ सूखा पर आंसू नही
सबकुछ सहन पर अन्याय नही


हमें आजाद हुये 70वर्ष बीत गये पर आजादी के 70वर्ष बाद भी नही बदली तो नारी की बदहाली | देश के कुछ नेताओं की सेवाओं से हर वर्ष तालाब खुदे और सूखे पर नही सूखा तो नारी का आंसू | देश में मेक इन इंडिया की शुरूवात हुई पर वैल्यू इज वोमेन, रिस्पेक्ट इज वोमेन की शुरूवात नही हो सकी | कई तरह के सर्वे होते हैं हमारे भारत में पर आज तक यह सर्वे नही कि कितने लोग नारी का सम्मान करते | कितने लोग उसकी परेशानी में उसके साथ खड़े होते | समझ में तो यह नही आता जो काले मन का पापी व्यक्ति हमारी फूल सी बच्चियों के साथ खुले आम भयमुक्त होकर दुष्कर्म करके उन्हें जीते जी मार डालते हैं तो क्यों पुलिस उनको पकड़ने के बाद उनके चेहरे को काले कपड़े से उन्हें ढ़कने देती है ? जिनको शर्म के मायने नही मालूम जिन्होने बच्ची की आबरू तार-तार कर दी, उनको कपड़ा क्यों ? क्यों उनके चेहरे समाज को देखने नही देते ? क्यों उनको बीच चौराहे पर पूरे समाज के सामने जलील किया और पीटा नही जाता? क्यों जल्द फांसी नही दी जाती ? पूरा समाज इन आतताइयों को पिटता देखेगा तो इन जैसे लोग के मन में भय तो उत्पन्न होगा और जब तक बुराई को अच्छाई का भयंकर भय नही होगा तब तक कुकर्मियों के मंसूबे पूरे होते ही रहेगें | समाज के पापियों को समाज के सामने जब तक शर्मिंदा नहीं किया जायेगा और समाज के सामने जबतक इनपर लाठी नही बरसायी जायेगी तब तक इस टाइप की मानसिकता वाले लोग सुधरने वाले कतई नही हैं | हम आप अधिकारी व जनसेवक लोग प्रतिदिन अखबार में पढ़ते कि उस बेटी को ससुराल वालों ने दहेज में कार न मिलने पर  घर से निकाल दिया | लड़की घर आ जाती है | सभी को पता चल गया कि ससुराल लालचियों का अड्डा है, वह घर नही नर्क है पर फिर भी समाज के लोग उस बेटी को ही गलत ठहराते, उसे ही ताने देते | सारा ज्ञान पूरा धर्म उसी पर ही क्यों उडेला जाता | हमेशा घर की इज्जत की दुहाई बेटी को ही क्यों दी जाती है फिर चाहे वह इस इज्जत के फंदे में घुट कर उसकी जॉन ही क्यों न चली जाये | देखो तो हमारे नारी पूजनीय महान के संकीर्ण की कपटी गिरी हुई मनोदशा कि बेटी के मरने के दुख से ज्यादा घर की इज्जत की पड़ी है बेटी की मौत के दुख से ज्यादा उसके सुहागन होने की खुशी है | ससुरालीजन थाना अदालत के डर से नाटकीय ढंग से बेटी को लेने आ जाते कि अभी ले आते हैं मामला ठण्ड़ा हो जाये फिर इसका धीरे से काम लगा देगें | बेटी सबकुछ  भांप कर जाने से मना करती है कि उस घर नही जाना पर यह समाज का वही घिसा पिटा डायलॉग बेटी जाओ ससुराल ही तेरा घर है |मायके का रहना नर्क होवे है| बस उसे धकेल दिया गया उस अहंकारी लालची भट्टी में जहां बिन मौत मरना तय है | बस अगले महीने दिमागी बुखार से उस बेटी की मौत | इस बेटी को महानता का ठप्पा लग गया कि सुहागन गयी तुमरी बिटिया इह तो अच्छी मौत भयी | यह समाज हमेशा दर्द, आंसू और मौत को ही महानता का दर्जा देता | यही बेटी दर्द से भाग कर किसी और से शादी करके खुश रहती जिन्दा रहती तो यही समाज उसे कुलक्षणी और कुल्टा व चरित्रहीन कह-कह कर शब्दरूपी खंजरों से हर पल गोदता रहता कि जब तक वह हताश होकर आत्मघात न कर लेती| हम पूछना चाहते हैं समाज के उन ठेकेदारों से क्यों क्या नारी आंसु बहाने के लिये ही जन्मती है ? क्या बेटी को जीने का खुश रहने का हक नही | बेटा प्रेम विवाह कर सकता है पर बेटी नही ? क्यों बेटी क्या इंसान नही? उसके सपने नही ? हमेशा बेटियों को ही टोका जाता कि बालों में फूल न लगाओं, फैशन न करो, स्लीवलैश कपड़े न पहनों , टाइट जींश न पहनों , कुवारी हो लिपस्टिक मत लगाओ | हद हो गयी कुवारे पर फैशन न करो और शादी के बाद बच्चा सम्भालों मतलब बेटियों की छोटी सी भी खुशी और छोटी सी भी आजादी समाज को हजम नही होती | दुख से कहना पड़ता है कि बेटी से हमेशा छीना गया पर उसे दिया कुछ न गया , ऊँची पहाड़ी पर नंग चल कर यह समाज मांतारानी को चुनरी चढा आया पर घर की बहू को एक साड़ी दिल से न दी जा सकी, मंदिरों में देवियों का पूजन- श्रंगार कर खुश कर आया पर घर की कन्या को जो से खिलखिलाता  देख डांटा गया कि लड़कियां इतनी जोर से नही हंसा करती , फूलों का श्रंगार नही किया करती|ये तो हद है कि जो लड़का बेटियों को   छेड़ता है जो उन्हें कुदृष्टि से घूरता है उसे पीटने के बजाय बेटी को पीटा जाता है  क्यों? उसकी पढाई बन्द करवा दी जाती क्यों ? उसे अपने ही घर में नजरबंद कर दिया जाता है क्यों ? फिर उसकी तुरन्त शादी करवा दी जाती है क्यों? हद तो तब हो जाती कि जब छेड़ने वाले यहां तक की दुष्कर्मी व्यक्ति से जबरन अपनी निर्दोष बेटी की शादी करवा दी जाती | बोलो जो इंसान आपकी बेटी को छेड़े उसकी जिंदगी बर्बाद करे उसको जेल में फैंकने के बजाय आप उसकी जेल में ताउम्र अपनी निर्दोष बेटी को धकेल देते हो | यह विकृत सोच आपको कौन देता है ? इस सोच के देने वाले समाज के कुछ मतिहीन क्रूर ठेकेदारों का भी सरकार को पुलिस को संज्ञान लेना चाहिये जिन्होने समाज को लकीर का फकीर बना रखा है और बेटों और बेटियों में खाई को खोद रखा है और जिन्होने हमारी बेटियों को जीते जी मार रखा है | हमारे देश में कन्या प्रथम पूज्य है |हमारे देश में साल में नवरात्रि दो बार आती और पूरे अट्ठारह दिन कन्यापूजन दिवस उत्सव के रूप में मनाया जाता और उसी देश में कन्याओं के साथ जघन्य अपराध दुष्कर्म हो रहा है| यह बेहद निनंदनीय है| समाज के प्रति व्यक्ति को बेहद सतर्क और संवेदनशील और जिम्मेदारी का परिचय देने की जरूरत है कि जिससे ऐसी घिनौनी मानसिकता के लोग बख्शे न जा सकें | इस दिशा में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योग्यदान देना होगा जिससे ऐसी निनंदनीय घटनाओं पर हमेशा के लिये विराम लग सके और आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ्य समाज में खुली हवा में श्वांस ले सकें और निडरता से अपने सपनों को पंख दे सकें और ऊँची उड़ाने भर सकें | समाज की ईकाई हम और आप हैं हमें और आपको स्वस्थ्य सोच रखनी होगी तभी हम वह भारत देख पायेगें जो हम सोचते हैं | वैसे भी यह समाज बेटी को नारी को सिर्फ मौन मूर्ती पाषाण बनाकर पाषाण समझ कर पूजने में आनंदित है, बस |
हे ! समाज के लोगों कब तक पाषाड़ों को पूजोगे कभी तो जीवन को भी पूजिये | समाज के एक दहेज लोभी परिवार ने और लालची पति ने अपनी निर्दोष पत्नी की जान ले ली तो वह सुहागन गयी कोई गम नही| क्या पत्नी  के सामने पति गुजर जाये तो यही समाज पत्नि को बिधवा कहकर उसको शुभ कार्यों में बैठना वर्जित कर देते हैं पर क्या यही सब पुरूष को सहना पड़ता तो जवाब है नही | आज बीवी मरे कल पुरूष शादी कर ले समाज कुछ नही कहता बीवी मुस्कुरा कर  किसी से बोल भी दे तो समाज उंगली उठा देता | हमारे समाज में बहुत बदलाव आये लोग साफ -सुथरे फैशनेबल हो गये पर नही बदली तो नारी की दुर्दशा | आज जब वह नौकरी कर रही तो ससुराल केवल सैलरी को ही अपनी बहू मान बैठा है | उसे तो पढ़ी- लिखी मुफ्त में कामवाली और कामकाजी और कमाऊ दासी जो मिल गयी है | नौकरी वाली महिलायें तो और भी ज्यादा शोषण सह रही हैं | घर में सास दुखी कर रही स्कूल में सरकारी आदेश कि एक ही शिक्षक से सभी विषय पढ़वाये जा रहे और दबाव की गुणवत्ता नही | समाज में दुष्कर्म की घटनायें इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि ग्रामीण लोग अपनी नाबालिक बेटियों का विवाह कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं | बेटियों की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं जिनमें बेटियों को दबाकर घर में रखने पर उनका शारीरिक व मानसिक विकास रूक गया है और उनमें कुपोषण व कम उम्र में माँ बनने पर उनकी जॉन पर खतरा मंडरा रहा है | सरकार को बेटियों की महिलाओं की बदहाली पर गम्भीरता से ध्यान देना होगा | नही तो एक दिन समाज की इस असमानता से मजबूर बेटियों की प्रश्नपूछती आंखों और सुलगते आँसुओं में पूरी मानवता शर्म से डूब जायेगी और जब दसों दिशायें, यह धरती ,प्रकृति और नियति भी इस असंतुलन को जब बर्दास्त नही कर सकेंगी तो हम सभी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी | तब, प्रकृति का कोप भूकम्प और सुनामी सा कहर बन हम सभी पर टूटेगा क्योंकि प्रकृति को किसी भी तरह का असुंतलन बिल्कुल बर्दास्त नही |



स्वलिखित रचना
आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'

Saturday, July 22, 2017

बदलाव के बाद भी बदहाल है नारी ?

बदलाव के बाद भी बदहाल है नारी ?

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     अन्याय
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सबकुछ बदला पर सोच नही
सबकुछ पाया पर प्रेम नही

सबकुछ मांगा पर बेटी नही
सबकुछ दिया पर सम्मान नही

सबकुछ हारा पर अहंकार नही
सबकुछ जीता पर हृदय नही

सबकुछ जागा पर आत्म नही
सबकुछ प्यारा पर स्वप्न नही

सबकुछ छीना पर दर्द  नही
सबकुछ  मिला पर हमदर्द नही

सबकुछ समझा पर इंसान नही
सबकुछ मिटा पर अस्तित्व नही
सबकुछ छूटा पर रूढ़िवाद  नही
सबकुछ थमा पर अत्याचार नही

सबकुछ देखा पर सबूत नही
सबकुछ मेरा पर वजूद नही

सबकुछ सूखा पर आंसू नही
सबकुछ सहन पर अन्याय नही



बदहाल है नारी ?


हमें आजाद हुये 70वर्ष बीत गये पर आजादी के 70वर्ष बाद भी नही बदली तो नारी की बदहाली | देश के कुछ नेताओं की सेवाओं से हर वर्ष तालाब खुदे और सूखे पर नही सूखा तो नारी का आंसू | देश में मेक इन इंडिया की शुरूवात हुई पर वैल्यू इज वोमेन, रिस्पेक्ट इज वोमेन की शुरूवात नही हो सकी | कई तरह के सर्वे होते हैं हमारे भारत में पर आज तक यह सर्वे नही कि कितने लोग नारी का सम्मान करते | कितने लोग उसकी परेशानी में उसके साथ खड़े होते | समझ में तो यह नही आता जो काले मन का पापी व्यक्ति हमारी फूल सी बच्चियों के साथ खुले आम भयमुक्त होकर दुष्कर्म करके उन्हें जीते जी मार डालते हैं तो क्यों पुलिस उनको पकड़ने के बाद उनके चेहरे को काले कपड़े से उन्हें ढ़कने देती है ? जिनको शर्म के मायने नही मालूम जिन्होने बच्ची की आबरू तार-तार कर दी, उनको कपड़ा क्यों ? क्यों उनके चेहरे समाज को देखने नही देते ? क्यों उनको बीच चौराहे पर पूरे समाज के सामने जलील किया और पीटा नही जाता? क्यों जल्द फांसी नही दी जाती ? पूरा समाज इन आतताइयों को पिटता देखेगा तो इन जैसे लोग के मन में भय तो उत्पन्न होगा और जब तक बुराई को अच्छाई का भयंकर भय नही होगा तब तक कुकर्मियों के मंसूबे पूरे होते ही रहेगें | समाज के पापियों को समाज के सामने जब तक शर्मिंदा नहीं किया जायेगा और समाज के सामने जबतक इनपर लाठी नही बरसायी जायेगी तब तक इस टाइप की मानसिकता वाले लोग सुधरने वाले कतई नही हैं | हम आप अधिकारी व जनसेवक लोग प्रतिदिन अखबार में पढ़ते कि उस बेटी को ससुराल वालों ने दहेज में कार न मिलने पर  घर से निकाल दिया | लड़की घर आ जाती है | सभी को पता चल गया कि ससुराल लालचियों का अड्डा है, वह घर नही नर्क है पर फिर भी समाज के लोग उस बेटी को ही गलत ठहराते, उसे ही ताने देते | सारा ज्ञान पूरा धर्म उसी पर ही क्यों उडेला जाता | हमेशा घर की इज्जत की दुहाई बेटी को ही क्यों दी जाती है फिर चाहे वह इस इज्जत के फंदे में घुट कर उसकी जॉन ही क्यों न चली जाये | देखो तो हमारे नारी पूजनीय महान के संकीर्ण की कपटी गिरी हुई मनोदशा कि बेटी के मरने के दुख से ज्यादा घर की इज्जत की पड़ी है बेटी की मौत के दुख से ज्यादा उसके सुहागन होने की खुशी है | ससुरालीजन थाना अदालत के डर से नाटकीय ढंग से बेटी को लेने आ जाते कि अभी ले आते हैं मामला ठण्ड़ा हो जाये फिर इसका धीरे से काम लगा देगें | बेटी सबकुछ  भांप कर जाने से मना करती है कि उस घर नही जाना पर यह समाज का वही घिसा पिटा डायलॉग बेटी जाओ ससुराल ही तेरा घर है |मायके का रहना नर्क होवे है| बस उसे धकेल दिया गया उस अहंकारी लालची भट्टी में जहां बिन मौत मरना तय है | बस अगले महीने दिमागी बुखार से उस बेटी की मौत | इस बेटी को महानता का ठप्पा लग गया कि सुहागन गयी तुमरी बिटिया इह तो अच्छी मौत भयी | यह समाज हमेशा दर्द, आंसू और मौत को ही महानता का दर्जा देता | यही बेटी दर्द से भाग कर किसी और से शादी करके खुश रहती जिन्दा रहती तो यही समाज उसे कुलक्षणी और कुल्टा व चरित्रहीन कह-कह कर शब्दरूपी खंजरों से हर पल गोदता रहता कि जब तक वह हताश होकर आत्मघात न कर लेती| हम पूछना चाहते हैं समाज के उन ठेकेदारों से क्यों क्या नारी आंसु बहाने के लिये ही जन्मती है ? क्या बेटी को जीने का खुश रहने का हक नही | बेटा प्रेम विवाह कर सकता है पर बेटी नही ? क्यों बेटी क्या इंसान नही? उसके सपने नही ? हमेशा बेटियों को ही टोका जाता कि बालों में फूल न लगाओं, फैशन न करो, स्लीवलैश कपड़े न पहनों , टाइट जींश न पहनों , कुवारी हो लिपस्टिक मत लगाओ | हद हो गयी कुवारे पर फैशन न करो और शादी के बाद बच्चा सम्भालों मतलब बेटियों की छोटी सी भी खुशी और छोटी सी भी आजादी समाज को हजम नही होती | दुख से कहना पड़ता है कि बेटी से हमेशा छीना गया पर उसे दिया कुछ न गया , ऊँची पहाड़ी पर नंग चल कर यह समाज मांतारानी को चुनरी चढा आया पर घर की बहू को एक साड़ी दिल से न दी जा सकी, मंदिरों में देवियों का पूजन- श्रंगार कर खुश कर आया पर घर की कन्या को जो से खिलखिलाता  देख डांटा गया कि लड़कियां इतनी जोर से नही हंसा करती , फूलों का श्रंगार नही किया करती|ये तो हद है कि जो लड़का बेटियों को   छेड़ता है जो उन्हें कुदृष्टि से घूरता है उसे पीटने के बजाय बेटी को पीटा जाता है  क्यों? उसकी पढाई बन्द करवा दी जाती क्यों ? उसे अपने ही घर में नजरबंद कर दिया जाता है क्यों ? फिर उसकी तुरन्त शादी करवा दी जाती है क्यों? हद तो तब हो जाती कि जब छेड़ने वाले यहां तक की दुष्कर्मी व्यक्ति से जबरन अपनी निर्दोष बेटी की शादी करवा दी जाती | बोलो जो इंसान आपकी बेटी को छेड़े उसकी जिंदगी बर्बाद करे उसको जेल में फैंकने के बजाय आप उसकी जेल में ताउम्र अपनी निर्दोष बेटी को धकेल देते हो | यह विकृत सोच आपको कौन देता है ? इस सोच के देने वाले समाज के कुछ मतिहीन क्रूर ठेकेदारों का भी सरकार को पुलिस को संज्ञान लेना चाहिये जिन्होने समाज को लकीर का फकीर बना रखा है और बेटों और बेटियों में खाई को खोद रखा है और जिन्होने हमारी बेटियों को जीते जी मार रखा है | हमारे देश में कन्या प्रथम पूज्य है |हमारे देश में साल में नवरात्रि दो बार आती और पूरे अट्ठारह दिन कन्यापूजन दिवस उत्सव के रूप में मनाया जाता और उसी देश में कन्याओं के साथ जघन्य अपराध दुष्कर्म हो रहा है| यह बेहद निनंदनीय है| समाज के प्रति व्यक्ति को बेहद सतर्क और संवेदनशील और जिम्मेदारी का परिचय देने की जरूरत है कि जिससे ऐसी घिनौनी मानसिकता के लोग बख्शे न जा सकें | इस दिशा में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योग्यदान देना होगा जिससे ऐसी निनंदनीय घटनाओं पर हमेशा के लिये विराम लग सके और आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ्य समाज में खुली हवा में श्वांस ले सकें और निडरता से अपने सपनों को पंख दे सकें और ऊँची उड़ाने भर सकें | समाज की ईकाई हम और आप हैं हमें और आपको स्वस्थ्य सोच रखनी होगी तभी हम वह भारत देख पायेगें जो हम सोचते हैं | वैसे भी यह समाज बेटी को नारी को सिर्फ मौन मूर्ती पाषाण बनाकर पाषाण समझ कर पूजने में आनंदित है, बस |
हे ! समाज के लोगों कब तक पाषाड़ों को पूजोगे कभी तो जीवन को भी पूजिये | समाज के एक दहेज लोभी परिवार ने और लालची पति ने अपनी निर्दोष पत्नी की जान ले ली तो वह सुहागन गयी कोई गम नही| क्या पत्नी  के सामने पति गुजर जाये तो यही समाज पत्नि को बिधवा कहकर उसको शुभ कार्यों में बैठना वर्जित कर देते हैं पर क्या यही सब पुरूष को सहना पड़ता तो जवाब है नही | आज बीवी मरे कल पुरूष शादी कर ले समाज कुछ नही कहता बीवी मुस्कुरा कर  किसी से बोल भी दे तो समाज उंगली उठा देता | हमारे समाज में बहुत बदलाव आये लोग साफ -सुथरे फैशनेबल हो गये पर नही बदली तो नारी की दुर्दशा | आज जब वह नौकरी कर रही तो ससुराल केवल सैलरी को ही अपनी बहू मान बैठा है | उसे तो पढ़ी- लिखी मुफ्त में कामवाली और कामकाजी और कमाऊ दासी जो मिल गयी है | नौकरी वाली महिलायें तो और भी ज्यादा शोषण सह रही हैं | घर में सास दुखी कर रही स्कूल में सरकारी आदेश कि एक ही शिक्षक से सभी विषय पढ़वाये जा रहे और दबाव की गुणवत्ता नही | समाज में दुष्कर्म की घटनायें इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि ग्रामीण लोग अपनी नाबालिक बेटियों का विवाह कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं | बेटियों की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं जिनमें बेटियों को दबाकर घर में रखने पर उनका शारीरिक व मानसिक विकास रूक गया है और उनमें कुपोषण व कम उम्र में माँ बनने पर उनकी जॉन पर खतरा मंडरा रहा है | सरकार को बेटियों की महिलाओं की बदहाली पर गम्भीरता से ध्यान देना होगा | नही तो एक दिन समाज की इस असमानता से मजबूर बेटियों की प्रश्नपूछती आंखों और सुलगते आँसुओं में पूरी मानवता शर्म से डूब जायेगी और जब दसों दिशायें, यह धरती ,प्रकृति और नियति भी इस असंतुलन को जब बर्दास्त नही कर सकेंगी तो हम सभी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी | तब, प्रकृति का कोप भूकम्प और सुनामी सा कहर बन हम सभी पर टूटेगा क्योंकि प्रकृति को किसी भी तरह का असुंतलन बिल्कुल बर्दास्त नही |



स्वलिखित रचना
आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'