Monday, February 29, 2016

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :




महिला आज भी एक उपेक्षित आँसू

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सोच को विस्तार कहाँ
बातों को आधार कहाँ
निर्धन को प्रेम कहाँ
औरत को सम्मान कहाँ

दोस्तों हम सभी जानते हैं कि इस 8 मार्च 2016 दिन मंगलवार को सम्पूर्ण विश्व, विश्व अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है |इस महिला दिवस के पीछे महिलाओं की पहली वो आवाज थी जब वर्ष 1908 में न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम कर रहीं महिलाओं ने अपने कार्य की समय सीमा तय करने, सही तनख्वाय, और अपने वोट के हक के लिये आवाज बुलन्द की थी | यह घटना विश्व के इतिहास की इतनी प्रभावशाली घटना थी कि वर्ष 1909 में अमेरिका की सोशलिष्ट पार्टी ने पहली बार नैशनल वुमन डे मनाया जिससे महिला शक्ति जाग उठी थी और अब उसने वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के खिलाफ जोरदार प्रदर्शनों को अंजाम दिया | फिर इन सभी प्रदर्शनों को महिला अधिकारों से जोड़ते हुए एक इतिहास रच गया जब 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया गया | यह था वो वर्ष 1900 का अमिट एतिहासिक पल और आज वर्ष 2016 यानि 116 वाँ वर्ष तो क्या बदलाव और सुधार आया है इतने संघर्षपूर्ण वर्षों में, हमारे देश की गाँव, कस्बे छोटे-बड़े शहरों और ज्यादातर महिला आज भी मानसिक संघर्ष से हर पल जूझ रही है | इस बात की पुष्टी नीलसन सर्वे ने कर दी है और चौंकाने वाले आंकड़े हम सभी के सामने है जिसमें 87% भारतीय महिलाओं ने माना है कि वो बहुत तनाव में है और 82% भारतीय महिलाओं ने माना कि उन्हें आराम करने का वक्त तक नही यानि दिनभर ऑफिस फिर घर-बच्चों की जिम्मेदारी फिर पति की और समाज की खरी-खोटी और अपमान,मतलब कि स्थति यह है कि उसे रोने तक का वक्त नही,भारतीय महिला का आसूँ तक इतना उपेक्षित है कि वो भी सम्मान के लिये रो रहा | आखिर कब सुधरेगी महिला के सम्मान की तस्वीर और कैसे भरे जा सकेगें उसमें खुशहाली के रंग | आज जब हमारे हिन्दुस्तान ने इतनी प्रगृति कर ली है कि चाँद पर पानी की खोज कर ली है और दुनिया उसे सम्मान दे रही है और दूसरी तरफ उसी महान देश की लैंगिक इन्डेक्स में पिछड़ गया है यह तथ्य सामने आया है जेनेवा स्थित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के वार्षिक लैंगिक समानता इण्डेक्स में भारत 114वें स्थान पर खिसक गया है क्या ये चिंता का विषय नही है |इस हालत का जिम्मेदार हमारी विकृत मानसिकता ही है जो बेटा और बेटी में फर्क के ग्राफ को बढ़ाये हुए है | इसलिये बेटी की शिक्षा बहुत जरूरी है क्योंकि नारी की दशा तभी सुधर सकती है जब खुद नारी शिक्षित हो और खुद को सुरक्षित रखने में सक्षम हो |भारतवर्ष की महिला इतनी महान है कि उसे किसी तरह के आरक्षण से ज्यादा सम्मान और प्रेम की आवश्यकता है जो सच पूछो तो उसे अपने ही परिवार से नहीं मिलता | हद तो तब हो जाती है जब उसे कमाऊँ बहू जैसे लालची शब्द से परिभाषित किया जाता है और दहेज के रूप में चलता-फिरता एटीएम समझ लिया जाता है और प्रतिपल वह अपनी जिंदगी घुट-घुट के जीती है |क्योंकि अगर वो विद्रोह करके मायके भी लौट आये तो विडम्ना है कि समाज की उपेक्षित नजरें और व्यंगात्मक ताने उसे जीने ही नही देते | महिला का पिछड़ापन कुछ और नही दकियानूसी सोच और विकृत मानसिकता के अतरिक्त कुछ नहीं है | जब तक हम हमारी सोच में सकारात्मक परिवर्तन नहीं लायेगें तब तक महिला शोसित होती रहेगी|इसीलिये देश की बेटी का शिक्षित होना अतिआवश्क है जो वो अपने हक की लड़ाई स्वंय लड़ने के काबिल और साहसी बन सके और अपने अपमान का मुँहतोड़ जबाव दे सके जिससे उसका या उसकी किसी सहकर्मी का आर्थिक, मानसिक, शारीरिक शोषण का विचार भी किसी के दिमाग में आने से डरे |हमें हमारे भारतवर्ष की बेटी को इतना सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है कि वह खुद एक पहिचान बनें और यह पहल हमें और आपको ही करनी हैं |तभी समाज और हम ब्लाग का लक्ष्य पूर्ण होगा|आइये हम इस बार हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मान दिवस के रूप में मानातें है और इसकी शुरूवात करते हैं अपने प्यारे ये परिवार से, अपनी पहली महिला शिक्षिता अपनी माँ को ताजे फूल देकर ,अपनी पत्नी, अपनी बहन - बेटी और अपने आस-पास की बुजुर्ग महिलाओं के पास थोड़ी देर बैठकर, अपना थोड़ा सा समय उनको देकर जिन्होनें हम और आप को इस लायक बनाने में अपना सम्पूर्ण जीवन स्वाहा कर दिया पर हमको जीवन की सुगंध से सराबोर कर दिया |
दोस्तों, आइये सम्मान प्रणाम करते हैं सम्पूर्ण विश्व की प्रत्येक महिला को और प्रतिपल सहृदय उनके सम्मान का वचन लेते हैं और आइये मिलकर अंतर्राष्ट्रीय विश्वव महिला सम्मान दिवस मनाते हैं और भारतवर्ष के गौरवशाली एतिहास के सच्चे रक्षक होने का फर्ज निभाते हैं|

धन्यवाद

       

स्वरचित लेख
आकांक्षा सक्सेना
जिला- औरैया
उत्तर प्रदेश




Saturday, February 27, 2016

Tuesday, February 23, 2016

एक कदम



एक कदम आपका

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दोस्तों हमेशा सिर्फ अपने लिये जीना बस खुद के लिऐ सोचना क्या ये खुदगर्जी नहीं और क्या आप यही  जीवन चुनना चाहेंगे शायद नहीं |
कुछ लोग बड़े मंच पर खड़े होकर समाजहित, राष्ट्रहित, प्रेम और दया  की बड़ी - बड़ी बातें करते हैं पर देखा गया है कि वही लोग जब बस और ट्रेन का सफर कर रहे होते हैं तब अपने साथी यात्री को पूरी यात्रा में उसे खड़े हुऐ यात्रा करते देख,उनका मन नहीं पसीजता जो थोड़ा सा खिसक जाते और वो भी यात्री बैठ जाता | हम दुनिया को खुद को दिखाते तो बहुत महान है पर हैं कितनी संकीर्ण मानसिकता के | इस मानसिकता को बदलना बहुत जरूरी है | वैसे भी विड्म्ना यह है कि जो मूर्तिकार भूखा प्यासा एकाग्रचित हो पत्थर को तरास कर मूर्ति बनाता है | मूर्ति बनाने में उसकी कला और भक्ति दोनों के दर्शन होते हैं पर वह और उसका परिवार गरीबी में जीते हैं उसकी पूरी मेहनत भी उसे नहीं मिलती| एक मूर्ति खरीदने में भी बड़ा मोलभाव चलता | मूर्तिकार अपने रोटी चलाने के लिये अंतत: मूर्ति लागत से भी कम दाम में दे देता है पर देखो ! जो व्यक्ति मोलभाव करके मूर्ति ले गया उसने वो मूर्ति मंदिर में लगा ली और बोला कि जमीन की खुदाई में निकली है फिर क्या दिनों - दिन वो लाखों की कमाई कर डालता है | मतलब यह कि जिसने सच्ची लगन और भक्ति में डूब कर मूर्ति बनायी वो गरीब का गरीब रहा | जिसने मूर्ति खरीदी वो देश के वी.वी.आई.पी. के साथ भोजन कर रहा और रात मंदिर में चढ़ावा गिन रहा और सुबह गुरू के रूप में पूजा जा रहा| ये तो वही बात हुई कि मूंगफली हमेशा फली ही रही उसको गिरी की पहिचान कभी हासिल न हो सकी |आज देश में भारी बदलाव की जरूरत है और सच्चे व्यक्तित्व के लोगों को राजनीति की मुख्यधारा में आने की जरूरत है तभी ये भेदभाव,अंधविश्वास जैसी कुरीतियों से देश स्वतंत्र हो पायेगा | आइये एक कदम बढ़ायें सही कदम के लिये|

ब्लागिष्ट
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश


एक कदम






Your Step

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Friends always live for themselves what they think is just selfishness latter in itself and you would probably not choose this life.
Some people stood on the big stage Smajhit, national, love and mercy great - great things have been seen on the bus and train travel are the same ones that are awake and your fellow travelers to visit her standing in the tour seeing, they do not mind a little bit Pasijta are eroding and that the passengers. If we show ourselves to the world is very great on how narrow minded. It is important to change this mindset. It is that which Vidmna be focused thirsty hungry stone sculptor creates statue Tras. Devotion to his art and sculpture are seen on both he and his family live in poverty do not get him his whole work. Or buy a sculpture shows great bargains. To run your bread sculptor finally give the statue look at less than the cost price! He negotiated the person who took the statue and said that she had put the statue in the temple ground is excavated out what days - the day he puts earned millions. This meant that the true passion and devotion that made the statue in the sinking of the poor getting poorer. Those who bought the statue Vikvikaikpik With dining and night counting the offerings in the temple and worshiped as being Guru morning was the same thing that struck him was the knowledge of the peanut pods always could not ever achieve. Today, the need for change and true personality then they need to come into the political mainstream discrimination, prejudices and superstitions as the country will be free. Let's move to increase the right move.

Bloggist
Akanksha Saxena
District - Auraiya
Uttar Pradesh






सिर्फ बातें




  बातें

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अंगलियों के पोरों पर
गणना की सितारों की
इस अंधेरी दुनिया से
आशा की उजालों की
घर में रखा है फूटा बर्तन
बातें की हजारों की

कंकरीट पर रात बिताकर
सपने देखे महलों के
इस भिकारी दुनिया से
आशा की मिल जाने की
एक पुरानीबात छिपाकर
कोशिश की सो जानेकी

मुट्ठी में छिपाये आँसू की आँधीं
बातें की मुस्कुराने की
इस मूर्झित दुनिया से
आशा की स्व: जगाने की
पड़ोसी का नाम पता नही
बातें की मंगल पर जाने की


स्वरचित रचना
लेखिका
आकांक्षा सक्सेना
जिला औरैया
उत्तर प्रदेश


Monday, February 22, 2016

सर्वसुलभ हो भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र :

भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र की अनिवार्यता :

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देश के प्रत्येक विवाहित, जन्में व मृतक स्वदेशी एंव विदेशी भारतीय लाभार्थी नागरिक को अपने राष्ट्रीय मानवाधिकार व कर्तव्य के तहत अपने विवाह जन्म व मृत्यु का पंजीकृत वैधानिक, बीमाकृत संवैधानिक व लाईसैंसीकृत कानूनी सर्वोच्य निर्णायक भारतीय लाभार्थी नागरिकता का प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र अनिवार्य एंव परमावश्यक रूप से चाहिये ताकि उसकी भारतीय नागरिकता की प्रमाणिकता व सत्यता के पहिचान के सभी प्रकार के राजनैतिक समाजी सरकारी व मतकारी दस्तावेजों में तथा सभी प्रकार के आर्थिक समाजी अर्धसरकारी व कर्मचारी दस्तावेजों एंव सभी प्रकार के सामाजिक समाजी निजि व श्रमकारी दस्तावेजों में दाखिल विवाहित नागरिकों की विवाह तिथि की,दाखिल विवाहित व अविवाहित नागरिकों की जन्मतिथि की एंव खारिज मृतक नागरिकों की मृत्यु तिथि की पंजीकृत वैधानिक संख्या, बीमाकृत संवैधानिक संख्या एंव लाईसेंसीकृत कानूनी संख्या सम्बंधित कार्यालय के नाम पता सहित अनिवार्य एंव परमावश्यक रूप से दर्ज की जा सके यही सभी का विशेष एंव सामान्य राष्ट्रीय उच्चन्यायिक संरक्षण तथा भारतीय सर्वोच्य न्यायिक आरक्षण है|इन सभी भारतीय नागरिकों को अपने जीवन का उद्देश्य पूरा किया जाने हेतु इन्हें इनकी इच्क्षा व योग्यतानुसार निर्विवादित समान राजनैतिक समाजी सरकारी आजीविका व मतकारी पैंसन, समान आर्थिक समाजी अर्धसरकारी आजीविका व कर्मचारी पैंसन एंव समान सामाजिक समाजी निजी आजीविका व श्रमकारी पैंशन तथा बुनियादी सेवायें एंव बुनियादी सुविधायें अनिवार्य एंव परमावश्यक रूप से प्राप्त हो सकें|जिससे इन भारतीय नागरिकों का जनजीवन सुखमय व्यतीत हो सके ताकि कोई भी भारतीय लाभार्थी नागरिक वैधानिक, संवैधानिक व कानूनी रूप से दस्तावेजी लावारिस, बेरोजगार, गरीब, निराश, भूखा, निर्वस्त्र, बेघर, आत्महत्या करने को अथवा आतंकी, भ्रष्टाचारी व अन्यायी व बनने को कमजोर व मजबूर न हो सके और स्वदेश एंव विदेशों में अपनी भारतीय नागरिकता की प्रमाणिकता एंव सत्यता के लिये हैरान व परेशान न हो सके|
उपरोक्त कार्यप्रणाली देश-दुनिया के न्यायिक विकाश की है|


लेखिका
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश


Sunday, February 21, 2016

भले कुछ काम


भले काम

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जीवन के दिन चार 
कर लो भले कुछ काम

कश्मीरी पण्ड़ितों की
खामोश जिंदगी की
बेचैन खोयीं आँखें
क्यों हैं आज भी
उलझी,उपेक्षित बातें

काहे दंगा काहे फसाद
कर लो भले कुछ काम

जात-पात देश-धर्म
पर बन्द हो राजनीति
देश का गौरवशाली
इतिहास बन्द हों
इसपर कुठाराघात


जीवन के दिन चार
कर लो भले कुछ काम

हे!कलम तू भी कर
एक भला ये काम
जय हिन्द लिखकर
ही रूकना अब चाहे
स्याही भी ना दे साथ

जीवन के दिन चार
कर लो भले कुछ काम


स्वलिखित रचना
लेखिका
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश




Monday, February 15, 2016

जरूरत

वर्तमान की जरूरत

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अपने राष्ट्रीय मानवाधिकार व कर्तव्य के तहत देश के प्रत्येक विवाहित, जन्में व मृतक स्वदेशी व विदेशी भारतीय लाभार्थी नागरिक को अपने विवाह, जन्म व मृत्यु के  पंजीकरण, बीमाकरण व लाईसेंसीकरण के प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र पाने हेतु अपने मजरा, गाँव, कस्बा, नगर व महानगर के प्रत्येक मोहल्ले व कॉलोनी में भारतीय नागरिकों के विवाह, जन्म व मृत्यु के पंजीकरण, बीमाकरण व लाईसेंसीकरण के आधुनिक कार्यालयों की जरूरत है ताकि इन कार्यालयों से देश के नागरिक इस प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र को प्राप्त करके इनके प्रयोग द्वारा अपने जीवन का उद्धेश्य पूरा करने हेतु अपनी इच्क्षा व योग्यतानुसार राजनीतिक समाजी सरकारी आजीविका व मतकारी पैंसन तथा आर्थिक सामाजी अर्धसरकारी आजीविका व कर्मचारी पैंसन एवंम  सामाजिक समाजी निजी आजीविका व श्रमकारी पैंसन तथा बुनियादी सेवायें व सुविधायें अनिवार्य एवम् परमावश्यक रूप से प्राप्त कर सकें और अपना,अपने देश का व अपनी दुनिया का सृजनशील विकाश कर सकें| राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुख्य आयुक्त व मुख्य सचिव को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है | ताकि सभी का जनजीवन पारदर्शी, निर्विवादित, आनंदवादी, शिष्टाचारी व न्यायी
एंव वैधानिक संवैधानिक व कानूनी रूप से सुखमय व्यतीत हो सके ताकि देश दुनियां में फैली संस्कारहीनता, असमानता व अशान्ति समाप्त हो जाये | वर्तमान की
की जरूरत यही है |

ब्लागिष्ट
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश


Sunday, February 14, 2016

कानपुर और जबलपुर के न्यूज पैपर में प्रकाशित ब्लाग न्यूज

आभार
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उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के कर्म कसौटी अखबार
में प्रकाशित ब्लाग न्यूज और जबलपुर के साप्ताहिक अखबार जबलपुर दर्पण में प्रकाशित ब्लाग न्यूज,साप्ताहिक सनन्यूज न्यूज पैपर आपका बहुत -बहुत आभार |

















Saturday, February 13, 2016

गवरमेन्ट जॉब ही क्यों माँ...?

    

              


    पछतावा

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आज वेलेन्टाईन डे है यार कोई मस्त लव स्टोरी सुना अरे!कहाँ खोई है अंकिता बोल ना कुछ चल बता क्या हुआ ?
अंकिता ने कहा,"कुछ नहीं रिया मैं ठीक हूँ|
रिया,"देख ! अंकिता,तू अपनी माँ की कड़वी बातों को दिल पर ना ले एक दिन उनके पता चलेगा कि उनकी बेटी कितनी टेलेंटिट है जरा सोच ! तेरे पापा उड़ीसा माईन में सर्विस करते हैं वो तेरी माँ से मतलब नहीं रखते और पूरा घर तेरी माँ चलाती है कितनी मंहगाई है आज जिसपर जिम्मेदारी होती है वो थोड़ा चिड़चिड़ा हो ही जाता है |इसलिये चिन्ता न कर चल उठ मेरे बगीचे में दो मोर हैं चल दिखाती हूँ |अंकिता तैयार होकर जैसे ही घर के गेट पर पहुँचती है कि माँ जो बैंक में क्लर्क है वो फोन करती है तुरन्त अंकिता अपना मोबाईल निकालती है जी मम्मा वह कहती हैं | मेरी तुम पर पूरी नजर रहती है जाओ अंदर और पढ़ाई करो स्टॉफ कमीशन आयोग का बैंक पीओ का फोर्म भरा है तो चुपचाप तैयारी करो |रिया ने कहा,"यार ! तेरी माँ ये मोहल्ले की ये सामने वाली आंटी खबर देती है पर ये आन्टी कुछ ज्यादा सख्ती कर रही जो ठीक नही और रिया चली जाती है|
शाम को अंकिता पूजा कर रही होती है कि माँ चिल्लाती है इतनी देर पूजा की जाती है फालतू टाईम बरबाद न करो |एक अगरबत्ती के पैकेट की कीमत क्या है पता भी है कुछ |देखो! सभी के बच्चे सफल हो गये क्योंकि उन्होने टाईम का पढ़ाई में लगाया |तुमको शर्म नहीं आती कि रिया भी गवरमेन्ट जॉब में ना दहेज लगेगा और दमाद भी गवरमेन्ट मिल जायेगा |ये सब तेरी समझ में क्यों नहीं आता |अंकिता रो पड़ी और बोली," माँ,तुम क्यों परेशान हो तुम्हारी बेटी के लिखे लेख,कहानियाँ,कविता,गाने हर बड़े अखबार में छपते हैं मुझ पर यकीन करो माँ एक दिन आपकी बेटी का पूरी दुनिया में नाम होगा|माँ  चिल्लाकर बोली," लेख,कहानी छपते हैं इससे घर का खर्चा चल सकता है तेरी पूजा के धूपबत्ती आ सकती है बोल रोटी  आ सकती है सुन रोटी भी जीवन का एक सच है समझी |देख! अंकिता कलम पढ़ाई में चले अगर किस्से -कहानी में चली तो मुझसे बुरा भी मैं ही होयूगीं,चलो खाना खा लो और पढ़ो |
अंकिता रोते हुऐ बोली,"गवरमेन्ट जॉब ही क्यों माँ|"
माँ ने कहा,"चुपचाप खाना खाओ,कोई फालतू बात नही|अंकिता पढ़ती भी और चुपचाप लिखती भी रहती |एक दिन स्कूल से लौटते समय वह अचानक लड़खड़ाकर गिर गयी तो पीछे से बाईक से आ रहे उसके पुराने टीचर ने कहा,"अरे!अंकिता,आओ बैठो मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ अंकिता पर चला नहीं जा रहा था वो बैठ गयी |उसने सर से कहा बस यहीं उतार दो मैं चली जाऊंगी पर उन्होने गैट के सामने ही छोड़ा |अंकिता बोली,"धन्यवाद सर , नमस्ते सर |
सर ने कहा,"बेटा कोई बात नही वैसे तुम्हारे सभी लेख पढ़ता हूँ अखबार में मुझे गर्व है तुमपर एक दिन इस जिले का नाम तुम्ही रोशन करोगी अब मैं चलता हूँ|
अंकिता जान गयी कि शाम आफत आयेगी |
माँ बैंक से लौटी तो सामनेवाली आन्टी ने बुलाकर क्या भरा पता नहीं कि उन्होने अंकिता के मुँह पर दो-चार तमाचे जड़ दिये और बोली," कोई भी लड़का या मर्द ना मेरे घर के गेट और ना तेरे दिल के गेट तक नहीं पहुँचना चाहिये समझी मैं तेरी बहुत सोच समझ कर सही इंसान से शादी करूगी ये मर्द जात किसी कैंसर से कम नहीं मौत ही हो जाती है बस |कुछ दिन बाद रिजल्ट आने शुरू हो गये बैंक पीओ के रिजल्ट में फैल,एसएससी में भी फेल यह सब देख माँ ने अंकिता से बात करना ही बंद कर दिया |एक दिन अंकिता ने देखा माँ अकेले में रो रही कि मेरी इन्सल्ट होती है कि मेरी बेटी हर टेस्ट में असफल|यह सुनकर अंकिता ने कुछ सोचा और घर से दूर निकल गयी और सामने से आ रही ट्रेन को देखती रही फिर एक ट्रेन में चढ़ गयी पता ही नही था कहाँ जाना है क्या करना क्यों बस बैठ गयी उसका मन इतना भारी था कि वो सिर पकड़ कर बैठ गयी कुछ देर बाद पीछे से आवाजें आना शुरू हुई कि यार ऐअर फोर्स में सिलेक्शन हो गया मजा आ गया पेपर तो कठिन था पर लग गया तुक्का चल गया सिक्का यह सुनकर पीछे बैठा तमाम लड़का जोर से हँस पड़ा |अंकिता ने सोचा ये सब ऐअरफोर्स का टेस्ट देकर लोटे हैं तभी भीड़ है और कोई टीटी भी नहीं आ़या वो फिर चुपचाप चलती ट्रेन से कूद जाने के लिये आगें बढ़ती है कि तभी पीछे से कुछ सुनती है कि लड़के आपस में कह रहे, अब तो लेखिका अंकिता जी भी तुम्हें रिजेक्ट नहीं कर पायेगीं क्यों? यार आलेख ठीक कहा न हमने और सब हंस पड़े तो आलेख ने कहा,"हाँ,उसके शब्द मुझे आकर्षित करते हैं वो बहुत अच्छा लिखती हैं मैं उनसे जरूर मिलना चाहूँगा और फिर अपने दिल का हाल भी डाईरेक्ट बोल दूगा |यह सुनते ही अंकिता की दिल की धड़कन तेज हो गयी और पूरे तन-मन में अजीब सा कम्पन होने लगा वो आज पहली बार दिल से मुस्कुराई और अचानक तेज हवा ने उसे बाहर खींच लिया वो आज खुशी की उस दुनिया में में थी कि मौत उसे समेट रही थी और उसे होश न था |
तभी ट्रेन में कोई चिल्लाया ओय लड़की ट्रेन से गिर गयी आलेख ने बहुत कोशिस की पर ट्रेन न रूकी वो बोला,"पता नहीं कौन थी,भगवान उसे मुक्ति देना प्लीज|"
एक हप्ते के बाद आलेख डाईरेक्ट अंकिता के घर पहुँचता है तो उसकी तस्वीर पर चढ़ी माला देख वो टूट सा जाता है और वह बच्चे की तरह फूट-फूट के रो पड़ता है और ऐसा पछतावा कि हम दोनों उसी ट्रेन में पर मिल न सके | उसकी खामोश बैठी माँ कहती हैं तुम कौन पहिचाना नही|वो कहता है मैं आपकी बेटी का फैन हूँ और इंडियन ऐयर फोर्स में सिलेक्ट हूँ |मैं तो आपकी बेटी को आपसे मांगने आया था उससे शादी के लिये |
माँ बोली बहुत देर हो गयी जाओ लौट जाओ|
वह कहता है कि आपकी बेटी का रूम दिखा दो और उसकी लिखे गाने कहानी प्लीज मॉम |
माँ ने सोचा कचरा दूर हो वह बोली,"ये रूम है और वो पड़ा है उसका सामान |ऑलेख उसके सभी गाने लेख कहानियाँ सब बैग में भर कर बोलता है ये में ले जाऊँ |
वो कहती है लेलो अब जाओ इतना बताओ कि वो कब मिलती थी तुमसे|वो बोला हम कभी नही मिले उनके शब्दों ने उनके करीब ला दिया और इतना कहकर वो चला गया पीछे से माँ बोली लो ये है प्यार बेवकूफी के सिवाय कुछ नही |
आलेख ने मुम्बई जाकर महीनो सालें संघर्ष किया और उसकी मेहनत रंग लाई |अंकिता के लिखे गाने फिल्मों में आये मोहल्लों में बजने लगे उसकी लिखी कहानी पर सुपर हिट फिल्म बनी जो इतिहास बन गयी|
अंकिता की माँ अवार्ड ले रहीं थी अंकिता का टीवी पर सारी दुनिया उन्हें देख रही थी और आज वो सेलेबिर्टी बन चुकी थी|
एक दिन अंकिता की माँ ने कहा,"बेटा,मुझे माँफ कर दे आज में प्यार को भी समझ गयी और भगवान को भी मान गयी की पूजा व्यर्थ नही जाती पर बेटा अब अंकिता जिंदा नही तू शादी कर ले क्यों जीवन बरबाद कर रहा|वह मुस्कुराया और बोला,"माँ, वो जिन्दा है तभी तो मैं आज सुपर स्टार हूँ |वो कहीं नहीं गयी वो मुझ में है मेरी रूह बनकर |अंकिता की माँ बोली,"बेटा मैंने उसके हुनर का कभी सम्मान नही किया आज सबकुछ पाकर भी सबकुछ खो दिया और वो आज फूट-फूट कर रो पड़ी तो आलेख ने उनको अपने सीने से लगा लिया और कहा आप मेरी माँ हो और मैं अपनी माँ को कभी रोता नहीं देख सकता |माँ ने रोते हुए कहा," बेटा, में तुम्हारे सामने हाँथ जोड़ती हूँ मेरी अक्कू की सब किताबें लेख गाने कविता सब मुझे लौटा दो |इस दुनिया के लिये नही सिर्फ अपने लिये मैं उसका लिखा एक-एक शब्द पढ़ना चाहती हूँ ताकि मेरी आत्मा को सुकून मिल सके और पछतावे के इस स्राप से में मुक्त हो सकूँ जो मेैंने ही खुद को दिया है |
एक महीने बाद एक लेख छपता है अंकिता की माँ का जिसमें उन्होने लिखा था कि हैपी वैलेंटाईन डे मेरी बच्ची
मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ और प्यार से कहीं ज्यादा तुम्हारा सम्मान करती हूँ और मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मैं मेरी बेटी की फैन हूँ और रहूँगी,हमेसा |

धन्यवाद

स्वलिखित रचना(@कॉपी राईट)

आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश

शब्द प्रतिज्या औ पीथयान मैग्जीन में प्रकाशित ब्लाग...


बहुत - बहुत आभार

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धन्यवाद









भोपाल के राजधानी न्यूज पेपर में ब्लाग न्यूज

खब़र

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तेज न्यूज और न्यूज नेशन पर ब्लाग स्टोरी व न्यूज

खब़र में ...

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तेज न्यूज और न्यूज नेशन को बहुत - बहुत धन्यवाद जो उन्होने हमारी ब्लोग स्टोरी और न्यूज को तवज्जो दी|
शुक्रिया|


समाज और हम - फेसबुक , व्हाट्सएप पर लव फिर शादी
http://dhunt.in/TqK0



via समाज और हम - फेसबुक , व्हाट्सएप पर लव फिर शादी
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ब्लोग से बनायी पह्चान आकांक्षा सक्सेना ने


www.newsnationindia.com






धन्यवाद 






Thursday, February 11, 2016

बसंत एक आनंद उत्सव



बसंत एक संत

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कल 12 फरवरी है और पूरा देश बंसतोत्सव की तैयारियों में व्यस्त है | यह पर्व प्रकृति के श्रंगार का नवीनता,प्रेम और खुशी का पर्व माना जाता है|इस त्योहार में जहाँ एक ओर पतंगे उड़ाई जाती हैं कि हम पतंग की ही तरह आसमान की उँचाइयाों को स्पर्श कर सके| वहीं एक ओर माँ शारदे की पूजा की जाती है कि वो हमें ज्ञान और विवेक के उजालें प्रदान करें और हम जब उँचाईयों पर हों तब हम में धैर्य और स्थिरता और विनम्रता रूपी गुण आशिर्वादरूप में प्रदान कर हमें अविभूत करें|वैसे बसंत को सभी मौसम का राजा कहा जाता है पर हम इसे एक संत के रूप में देख रहें हैं जो हमें ये समझाता है कि बीती ताये बिसार दे और आंगे की सुध ले मतलब जीवन में घटी बुरी स्मृतियों को भुला कर आगें नये सिरे से जीवन जीने की कला सिखाता है |अरे ! बसंत का अर्थ ब से बहार,स से सभी,न नमन, त से तमन्ना अर्थात बसंत की एक मात्र तमन्ना यह है कि वह मानव,जीव और पादप सभी में अपने सुकर्मों द्वारा बहार लायें और प्रकृति के उस सुगंधित नव परिवर्तन को बारम्बार नमन करता रहे |बसंत एक संत के रूप पतझण रूपी दकियानूसी मानसिकता को हर वर्ष गिराकर नवीन सोच के भविष्य को चमकती कोपलों के रूप में जन्म देता है क्योंकि नवीनता प्रकृति का सत्य है जो भविष्य की महान सम्भावनाओं को जन्म देता है |आइये हम सब बसंत रूपी महान प्राकृतिक संत के कार्यों से सीख लें कि हम हमारी दकियानूसी सोच से बाहर आयें और अगर कुछ बदलना ही है तो आइये हम हमारी मानसिकता बदले और नवीन परिवर्तनों में खुद को सिद्ध करके दिखायें|बसंत हमारे जीवन में घटे,हमारी सोच में घटे,हमारे क्रिया-कलापो में घटे तब हम उस दिन सच्चा बसंतोत्सव मना रहे होगें बस उस परिवर्तन की शुरूवात हम और आप से क्योंनहीं बोलिये आज और अभी बसंत पंचमी से क्योंनहीं दोस्तों|
धन्यवाद


स्वलिखित लेख
लेखिका 
आकांक्षा सक्सेना
जिला औरैया
उत्तर प्रदेश




Sunday, February 7, 2016

समलैंगिक सम्बंधों के लिये जिम्मेदार कौन ?




उपेक्षा

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आज टी.वी चैनलों पर बड़ी बहस चल रही है समलैंगिकता पर और इस मुद्दे को मीडिया में इतना हाईलाईट किया जा रहा है जो ठीक नहीं हैं क्योंकि जब समाचार देखते समय छोटे बच्चे पूछते हैं कि इसका क्या मतलब है तो माता-पिता के पसीने छूट जातें हैं कि क्या जबाब दूँ|फिर वो ही बच्चा अपना प्रश्न किसी और से पूछकर अपनी जिज्ञासा को शांत तो कर लेता है पर अपने कोमल मन में उपजे उस वासना के अंतरद्वन्द को शांत नहीं कर पाता और वह अतत: गलत राह पर चल पड़ता है जो सिर्फ पतन की ओर ही जाती है|इस समलैंगिकता को हमने ही बढ़ावा दिया है |हमने अपने सपनों को अपने बच्चों पर जबरदस्ती थौप दिया है और इतना ही नहीं कि अपने बच्चों से अत्यधिक अपेक्षायें पालकर और सिर्फ अपने बच्चों को बढ़ता देखना और बार-बार उसे नीचा दिखाना कि तुमसे ज्यादा तो तुम्हारा दोस्त होशियार है |वो देखो ! दिन-रात पढ़ता है और सुन्दर भी | वो देखो ! सरकारी नौकरी में हैं तुम यहीं पड़े हो |वो देखो: मि. शर्मा का बेटा अमेरिका में शिफ्ट हो गया और एक हमारी किस्मत है बहुत खराब अरे !  वो तो नशीबवाले माँ-बाप हैं|ये सब जो झींटाकसी करते हैं हम हमारे बच्चों पर| यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है | इससे बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है और यह उपेक्षा ही बच्चे को गलत कार्य करने की दिशा में मोड़ देती है जहाँ से फिर उसकी वापसी सम्भव नहीं|हाँ, मानती हूँ आज का समय गलाकाट प्रतियोगिता का है तो जरूरी है हम बच्चों के सहयोगी बनें उनको प्यार करें और उनकी छोटी सी भी उपलब्धी पर उन्हें गले से लगा लें |पर, आज माता-पिता दोनो ही जब कामकाजी हैं तो टाईम ही नहीं अपने बच्चों के लिये |आज आधुनिकता इतनी हावी है कि हम स्वीकार्य ही नहीं कर पाते कि हम माता-पिता हैं और हमको कितनी जिम्मेदारी से इस रिश्ते को सींचना हैं|हद तो तब हो जाती है जब हम बच्चों को सामने आपस में लड़ते-झगड़ते,शराब पीते और अश्लील बातें,गानें और वीडियों तक देखने में परहेज नहीं करते|हम हमारे बच्चों को पैसे तो दे देतें हैं पर समय और प्यार नहीं ,मोबाईल तो दे देते हैं पर मनोबल नहीं बढ़ाते तब उसका अकेलापन नेट पर गन्दी साईट्स  जिनपर सरकार की कोई रोक नहीं उन्हें देखनेमें बीतता है और फिर अधूरी मनोदशा की चिढ़चिढ़ाहट में बच्चा बस और बस प्रेम ढ़ूढ़ता है फिर उसे वो अपने ही सहपाठी बालक या बालिका से ही क्यों न मिलें वो अपनी भावनाओं जाहिर कर पाता हैं और जो उसे सुनता है समझता है बस उसी  को प्रेम करने लग जाता है|क्या सही क्या गलत वो निर्णय नहीं कर पाता फिर|इसी तरह समाज से सताये हुऐ और पारिवारिक कलह से आहत बच्चे क्या बड़े भी फिर उस प्रेम और अपनेपन को ढूढ़ते हैं जो कि उन्हें अपने माता-पिता,सगे-सम्बंधियों और समाज से नहीं मिलता तो फिर जहाँ उन्हें अपनापन और सम्मान मिलता है प्रेम मिलता,सुकून मिलता है वो उन्हीं में कुछ ऐसे घुलमिल जाते हैं कि यह सब भूल जाते कि वो लड़का है या लड़की| वो उसे हीअपना हमदम मान कर उसी के साथ सारा जीवन जीने का का निश्चय कर बैठतें हैं और वो भी कानूनी तौर पर |अब पैरैन्ट्स को समाज को दुनियाभर को अजीब लग रहा है और हर जगह हंगामा मचा है|अरे! जब आपके पास अपने बच्चों के लिये समय ही नहीं था |तो अब ये हंगामा क्यों ?हमने अगर अब भी भारत के भावी भविष्य पर ध्यान नहीं दिया तो  इसी तरह के परिणाम सामने आयेगें| अब हम सभी को ना सिर्फ यह सब देखने बल्कि स्वीकार्य करने के लिये भी तैयार रहना पड़ेगा और या फिर हमें हमारे आघुनिक स्वभाव में परिवर्तन कर प्रकृति और प्राकृतिकता को ससमम्मान आत्मसात करना होगा तभी भारत के भावी भविष्य को सुरक्षित, सुशिक्षित और संस्कारी सच्चा भारतीय नागरिक बना सकेगें|

धन्यवाद

आपकी दोस्त
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश
ब्लोग लिंक
http://akaksha11.blogspot.com




Thursday, February 4, 2016

बहस का मुद्दा



              सहिष्णुता

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आज हम सभी ये रोज देख रहें हैं कि सभी न्यूज चैनल पर एक बहस शुरू तो हो जाती हैं पर वह मुद्दे से भटक के  निजि आरोप-प्रत्यारोप से घिर कर बस हंगामे और शोर पर खत्म हो जाती है समझ में नहीं आता कि हममें बस इतनी ही तितिक्षा बची है बस इतने ही सहिष्णु हैं हम|बुरा तो इस बात पर भी लगता है कि जब बहस का मुद्दा मंदिर-मस्जिद,शनि देव और सबको श्रद्धा -सब्र की बात कहने वाले सांई बाबा और गौ,गंगा और कन्या पर होती है जबकि हमारे देश में यह सभी पूज्यनीय हैं |अगर इन पर हम लोग बहस के नाम पर झगड़े करेगें राजनीति करेगें तो क्या इससे हमारे देश का नाम और प्रतिष्ठा कलंकित नहीं होगी |हमारा देश तो महान धार्मिक और स्वयं में तीर्थ देश कहलाता हैं |हम हमेसा सरकारों को कोसते हैं दूसरों पर दोषारोपण करते हैं पर खुद को नहीं देखते कि हमारे जीवन मूल्य कितने गिर गये|सोचो! उस समय हमारी सहनशीलता,संवेदना और दया कहाँ चली जाती है जब हमारी गाय दूध देना बन्द कर देती है,वह बूढ़ी-बीमार और कमजोर हो जाती है तो उसे बेसहारा सड़क पर छोड़ देते हैं झूंठन के नाम पर पॉलीथीनरूपी जहर खाने के लिये और गंगा-यमुना में कूड़ा फेंकने हम बन्द नहीं करते |नदियों की हालत किससे छुपी है और तो और हमारे देश की बेटियों पर जीन्स- दुपट्टे और मोबाइल पर बहस होती है और विडम्ना ये है कि आज भी चाँद-मंगल  पर पहुँचने वाले देश की बेटी रात्री में अकेले बस और ट्रेन का सफर करने से डरती है | तो बताओ कि बहस से बदलाव आ सकता है कि हम सुधर जायें तो बदलाव आ सकता है |बहस के लिये तो बहुत मुद्दे हैं कि आज भी गरीब इस जॉन लेने वाली भयंकर शर्दी में फुटपाथ पर क्यों हैं ? वो कॉलोनी में क्यों नहीं ? जबकि कॉलोनी सचपूछो तो इन्हीं के लिये होनी चाहिये |दो सौ रूपये अरहर की दाल है वो भी मिलावटी| हद तो यह है कि सरसों का तेल डालडे की तरह जम रहा है मतलब कि गरीब आदमी किसी तरह सुरक्षित नहीं| आज कपास मिल,जूट मिल,हथकरधा उद्दोग-कारखाने सब बन्द पड़े हैं इस कारण आज हालत यह है कि  बेरोजगार आत्म हत्या करने पर विवश हैं |और देश का  गरीब किसान आज भी गॉव में झोलाझाप डॉक्टरों के भरोसे हैं जो बहुत घातक स्थति हैं और प्रदेश का हर गाँव-कस्बा आज अच्छे डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है अत: देवी-देवताओं और धर्म-सहष्णुता पर राजनीति अब बन्द होनी चाहिये और मुद्दा अब सुधार -सुरक्षा,रोजगार और विकाश होना चाहिये तभी बदलाव का बसंत जन-जीवन के जीवन में आ सकेगा और तभी हमारा देश सही मायनों में स्वतन्त्र और विकसित राष्ट्र होगा 
आईये हम सब मिलकर हमारे देश को स्वच्छ और विकसित राष्ट्र बनाने में अपना सहयोग करें और देश के सच्चे नागरिक होने का दायित्व निभायें|

धन्यवाद

आपकी मित्र      
लेखिका 
आकांक्षा सक्सेना
जिला-औरैया
उत्तर प्रदेश