Sunday, January 31, 2016

सम्मान का अनुभव.....

पीथयान मैग्जीन अखबार में हमारे और आपके पंसीदादा ब्लाग का जिक्र.......धन्यवाद पीथयान टीम और धन्यवाद शब्द प्रतिज्या अखबार टीम...!
हमारे शब्दों को जन-जन तक पहुँजाने के लिये बारम्बार धन्यवाद|
आपकी मित्र
आकांक्षा सक्सेना
जिला औरैया
उ.प्र









Wednesday, January 20, 2016

कहानी

  

                       

                   

मेरे चाचू

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शर्दी और उस पर ये बरसात दद्दा मरे जात हैं कसम से,अलाव से आग तापते हुऐ बेचे चाचा बोले,बड़ी ठण्ड हैं|तभी उनकी बात काटते हुऐ मलखे दद्दा बोलो,"जे क्या ठण्ड है |ठण्ड तो हमाये जमाने में पड़त ती छप्पर पर ओले की चद्दर बिछ जात ती और दिन रात बस आग का ही आसरा होत हतो बस बा थी ठण्ड पर अब तो मॉर्डन जमाना है रूम हीटर जला लेत लड़के बहू बस काहे की शर्दी यह सुन कर सब हंस पड़े|तभी सामने से गाँव में कुछ दिन छुट्टी पर आये ऐअर फोर्स के अधिकारी लोकेश कुमार आकर बोले,"अरे! चाचा बड़ी जोर की हंसी आ रही क्या बात है हम भी सुने|तभी बेचें चाचा बोले,"अरे! लला लोटन |तभी आलोक जी बोले लोटन बोलोगे तो हम नहीं बैठेंगें यहाँ|ये सुनकर सब बोले जा अंग्रेजी ने ना सब प्रेम खत्म कर दओ|लुटनवा में जो दुलार है वो लोकेश शब्द में नही |लोकेश ने मन ही मन सोचा गाँव के गँवार क्या जाने लाईफ क्या चीज स्टेन्डर्ड क्या....तभी पास में बैठी तोजी मौसी बोली,"बिटवा लोकेश जे बता बड़े शहर में क्या कुछ होत है...बता ना वहाँ की शादी पार्टी...कैसी होत |लोकेश ने घमण्ड में भर के कहा,"मौसी जी शादी ऑनलाईन फिक्स होती हैं फेसबुक व्हाटस अप पर लव फिर शादी अपने मन से होती हैं अपने बराबरी में अपनी मर्जी में |अब ये नहीं कि माँ बाप किसी गंवार के पल्ले बाँध दें|मौसी तो सह सुन चुप हो गयीं पर मलखे दद्दा चुप न रह सके वो बोले,"लला गंवार किन्हें कहत हैं?" लोकेश बोला,"गंवार मतलब जिसे उठने-बैठने की अकल न हो और सामने वाले को अच्छी तरह अपनी बात से प्रभावित न कर सके वो गंवार है और जो बिना मतलब के काम करे फालतू बातों में वक्त बरबाद करें जिसे ये नही पता कि डियो और सेण्ट में क्या फर्क जो बालों की क्रीम मुँह पर पोत ले |ऐसे लोग गंवार नहीं तो क्या|ये सुनकर अलाव ताप रहे कभी गोद में खिलाये लोटन जो आज लोकेश बन चुका था कभी उसकी तोतली आवाज से सबके मन को सुकून मिलता था पर आज उसके इन शब्दों ने तो अलाव की आग को भी ठण्डा कर दिलों में सुलगा दिया था|वहीं पास में बैठी मौसी की नातिन जो ग्यारवीं में पढ़ती थी सब सुन रही थी वह बोली," लो ये देखो!आलू भी भुन गये लो खाओ ना लोकेश चाचा |लोकेश बोला,"ओह! चाचा न कहो अभी में जवान हूँ|मौसी की नातिन बोली,"चाचा सुबह से आप दिखे नही चलो अब बोल देती हूँ |लोकेश,"क्या ?" वो बोली," लोकेश के गले से लग के खुशी से हैपी न्यू यिअर चाचू|लोकेश बोला,"सैम टू यू फिर सबकी तरफ देख के बोला ,"सैम टू यू ऑल|वो बोली,"चाचू आज आपका और मेरा दोनो का बर्थ डे यानि जन्मदिन है |वो फिर से खुश होकर लोकेश के गले से लग के बोली,"हैपी बर्थ डे चाचू|लोकेश ने कहा,"सेम टू यू डियर प्रीती|बोल क्या गिफ्ट चाहिये माँग ले तेरा चाचू दुनिया की कोई भी बड़ी चीज तुझे ऐज ए गिफ्ट दे सकता है|वह बोली,"प्रोमिस|"
लोकेश पक्का अब जल्दी बोल|प्रीती ने कहा,"चाचू बस आज के बाद किसी से भी सेम टू यू मत बोलियेगा प्लीज |लोकेश ने प्रीती की तरफ देखा तो वह दूर हट कर बोली,"चाचा सब कुछ इतना भी सोर्ट ना कर दो कि प्रेम के लिये जगह ही न बचे चाचू|वह रो कर बोली,"चाचू आपमें मेरे अपने चाचू कहीं खो गये |गिफ्ट ही देना है तो मुझे मेरे वहीं गवार चाचू दे दो जो मुझसे हम सब के साथ ईखड -दूखड़, गोली-कंच्चा,लपा,घोड़ा-झमालखाई,आँख-मिचौली,छुआ-छुअल्ली खेलत् थे|वही चाचू मुझे लाकर दे दो लाओ मेरा गिफ्ट दो|आप मेरे चाचू नहीं वो इतने कंजूस कभी नहीं थे जो मुँह से बोले जाने वाले शब्दों की भी कंजूसी करें जो सेम टू यू बोले जो दिल खोल के आशीर्वाद भी न दे सके |वैसे सही कहा,"सेम टू यू चाचू थोड़ा शर्म करो शायद इसका ये मतलब भी होता है ना...|वो फूट-फूट के रो पड़ी |
लोकेश का घमण्ड़ कहाँ छू-मंतर हो गया उसे पता न चला एक छोटी सी बच्ची के प्रेम में वो सच्चाई थी कि वो सत्य को समझ गया कि उसने क्या गल्ती कर दी और यह भी कि अपने देश,गाँव,रिश्ते-सम्बंधों और उसकी विवधता को उसके प्रेम को कभी कम न आंकों|प्रेम से बड़ा कुछ नहीं होता और लोकेश ने अपनी भतीजी प्रीती को कंधे पर बैठा लिया और आज उसने महसूस किया कि एक छोटे बच्चे के शब्द भी जीवन की प्रेरणा बन सकते है|लोकेश ने कहा,"दद्दा माँफ कर दो|"कोई कुछ न बोला|तो लोकेश ने कहा," चच्चा अब भुकरे ही रहोगे कि भुने आलू ठण्डे करोगे लोटन ही हूँ ना थोड़ा सा लुढ़क गया था बस...यह सुनते ही सब जोर से हँस पड़े|और प्रीती अपने चाचू की गोद में बैठी आलू का श्वाद लेने लगी|

धन्यवाद  

स्वलिखित कहानी
लेखिका 
आकांक्षा सक्सेना
जिला - औरैया
उत्तर प्रदेश
समय शांय 1:36
दिनांक 20/01/2016
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Thursday, January 7, 2016

जब काटा गया हाँथ.......तब और सध गया हाँथ.....!!

                   

 शांति की रेखायें

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दोस्तों इस नये साल में आपसे पुरानी बात करने का कोई मन नहीं पर बहुत मेल मिलते हैं कि मुझे लिखने की शक्ति कहाँ से मिलती है? हर किसी के क्यों और कैसे का जवाब आज मैं जरूर दूँगी तो दोस्तों लिखती तो बचपन से ही हूँ |जब सामने किसी दुखी, बीमार,गरीब विकलांग भिखारी को देखती तो तब उन दिनों हम भी बहुत साधारण थे बड़ी मुश्किल से गुजर होती थी तो उसकी कैसे मदद करते| मगर मन बहुत करता कि उनको सीने से लगा लूँ |तो क्या करती कि कॉपी पर एक कहानी बनाती उनको कहानी का पात्र बनाती और खुद को सुपर हीरो बनाकर उनको ढेर सारी खुशियाँ दे डालती और उनको अमीर और अच्छा इंसान बना देती लिख डालती |एक दिन एक बहुत बीमार बाबा को खाना तो दे आयी पर उनकी खाँसी के लिये मेरे पास कुछ नहीं तुरन्त घर आयी और कहानी में मैंने उन बाबा को बिलकुल ठीर कर दिया बचपन ही था जो ठीक लगा सो कर दिया |लगभग दो-तीन दिन बाद वो बाबा दिखे और बोले बेटा तेरे टिफिन के खाने में जादू था मैं ठीक हो गया और हाँ रात को सपने में कोई आया जिसने मुझे सीने से लगा लिया भगवान थे शायद मैं देखो बिल्कुल ठीक|ये सुनकर मैं चौंक गयी बिल्कुल मेरी कहानी वाला सुुपर हीरो सीने से लगाकर हर दर्द हर लेने वाला जो लिखा सच हो गया| ऐसा कई बार हुआ तो एक अनजाने डर से कहानी लिखना बन्द कर दिया |



पर जब लोगों की बनावटी मुस्कुराहट देखती तो मन नही मानता कलम लिखने पर मजबूर हो जाती| तो फिर से लिखना शुरू किया और बहुत लिखा |ताज्जुब था कि मेरे ही एक परिवारी जन को मेरा लिखना अच्छा नहीं लगा |उनको ये लगता कि कहीं मेरा सारी दुनिया में नाम न हो जाये कहीं मैं उनसे ज्यादा धनवान न हो जाऊँ|और उनकी इस चिढ़ ने कब नफरत का रूप धारण कर लिया ये तो उनको भी शायद पता नहीं चला| फिर तो उनपर मानो राहू सवार हो गया| और उनकी ईर्स्या चरम पर थी| फिर उन्होनें प्रसाद में नशा खिलाकर अपना मन पूरा भी कर लिया|मैं हल्के बेहोशी मैं थी और उन्होनें मेरे हाँथ की नश काट डालने का प्रयास कर डाला और कहा कि मर गयी तो कह देंगें होगा किसी के साथ चक्कर-मक्कर |बाद में बदनामी भी ब्याज में,बहुत बढ़िया|
    हम अपना रक्तरंजित हाँथ देख बुरी तरह घबरा गयी कि आखिर! मेरा दोष क्या है| बस मैं नारायण नाम की शक्ति को मन में ले भागी|हद तो तब हो गयी जब उन्होनें हमारी लिखी रचनाओं की पूरी सौ नोटबुक आग में स्वाहा कर डालीं|वो नोटबुक नहीं मेरी आत्मा का संगीत था जिसको अग्नि देवता को पूरी तरह भेंट किया जा चुका था |ये वो दु:ख था जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी |ये बात हम भलीभांति जानते थे पर इंसान की जॉन और सम्मान से बड़ा कुछ नहीं होता बस यही सोचकर हमने उस व्यक्ति को हृदय से माँफ कर दिया क्योंकि मैं ही जानती हूँ कि माँफ कर देने से मेरी जो पढ़ाई-लिखाई की यात्रा का मार्ग अवरूद्ध ना हो |माँफी में शांति है और शांति ही सही हल था उस समय |बस दोस्तों किसी तरह उनके मनसूबे कामयाब न हो सके|फिर हमने वो स्थान छोड़ दिया और किराये के घरों में भटकते रहे पर कभी बदले की भावना को खुद पर कभी हावी न होने दिया और खून में सना हाँथ पर रूमाल बाँधकर कैमिस्ट्री का प्रेक्टिकल दिया जाकर और सफल हुई |पर दोस्तों विपरीत परिस्थितियों में भी लिखना बन्द नहीं किया |
और आज भी लिख रहीं हूँ |दोस्तों मैं यही कहूँगी कि जब कटा हाँथ तो और भी सध गया हाँथ |क्योंकि दर्द भी नहीं जख्म भी नहीं हाँ ये निशाँन हैं जो प्रेरणा बन गये कि लिखते रहो |अरे!हाँथों में रेखायें तो सबके होतीं हैं |हमारे तो कलाई में भी रेखायें बन गयीं|ये तो ढ़ेर सारी रेखायें हैं पर शांति की अपार सम्भावनाओं की| ये रेखायें हमारी ढ़ेर सारी वैचारिक क्षमतायें हैं जिसको कह सकते हैं सकारात्मक ऊर्जा की रेखायें,मेरे दोस्तों|
दोस्तों हमेशा याद रखो कि हमारे जीवन में दु:ख किसी गुरू से कम नही और दर्द ही हमारे सच्चे अध्यापक सिद्द होते हैं|
धन्यवाद


आपकी मित्र
लेखिका 
आकांक्षा सक्सेना
जिला -औरैया 
उत्तर प्रदेश



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