Sunday, March 10, 2013



आज प्रेम को
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आज  जिस्म को ज़िस्म से इतना लपेटा जाता है,इतना लपेटा जाता है
 क़ि लिपट -लिपट कर घुटन से उसका दम उखड जाता है ।





आकांक्षा सक्सेना
जिला औरैया
४ मार्च 2013 


सच समाज का 

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   खुबसूरत धुंध 



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मेरी अखियों को मिला
ख्वाब सुनहरा था
मेरे दिल को कोमल
पंखुड़ियों ने घेर था
तितलियों से आकर्षण का
मेरे नर्म होंठों पर रहता
उसकी चाहत का पहरा था
रोम -रोम में उसकी छुअन का
रहता इंतजार गहरा था
खिचने लगी बिन डोर उसकी
उसकी गर्म स्वांसों की ओर
मेरे दिल ने चुना,वो शख्स
हीरा था 


आज शाम हो रही नशीली थी
उसकी आहटों की मस्त
सुगंध फैली थी
क्या पता था आज
क्या होनेवाला था
दीदार उसका किसी भी
पल होने वाला था
उसकी परछाई मेरी परछाई
ये जा टकराई,ऐसा लगा मानो
स्वांस की स्वांस जा रही
उसकी निगाहें ज़िस्म पर
टिकी रह गयीं 


उसकी हर छुअन
ज़िस्म मैं ही सिमट गयीं
सारी ख्वाहिसें दम तोड़ने लगीं
मुस्कुरायीं मारे दर्द से आंखें
मेरी ,
मुझे प्रेम का हुआ एक भ्रम था
वो सिर्फ एक खुबसूरत धुंध था 



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आकांक्षा सक्सेना
जिला- औरैया
मार्च २०१३ 


Saturday, March 9, 2013

दर्द के रंग


                        दर्द के रंग

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देखो होली आई प्रिये 
आओ मिला कर नाचे गायें हम 
हर तखलीफ़ को भूल जायें हम 
रंगों कि मादक खुशबू में 
पोर -पोर भीग जायें हम 

में कैसे सज - धज आऊँ पिया 
 में कैसे त्योहार मनाऊँ पिया
मेरे हृदय के घाव हरे हैं  
में कैसे रंगों को हाथ 
लगाऊं पिया 

जब आज शहीद का शव 
बिन सिर के घर 
पहुँचाया जाता है 
शहीद कि पत्नी से 
अंतिम दर्शन भी 
छीना जाता है 
तो,इसी दर्द दोपहरी में 
मैं कैसे अश्रु छुपाऊँ पिया 


जब दुधमुही बेटी के साथ 
कुकृत्य हो जाता है 
फिर मुजरिम घर- परिवारी 
ही पकड़ा जाता है 
तो सोचो कैसा लगता है 
जीवन को दबाह करनेवाला 
चाँद सिक्कों मैं छूट घर 
आता है ,दिलों मैं लगी 
इस आग को देखकर 
मैं कैसे होलिका दहन 
कराऊं पिया 

 कभी जिनके आगन में
 तुलसी पर घी का
 दीपक जलता था 
 आज उसी घर का बच्चा
 सूखी रोटी से पला जाता है 
 तो ऐसी प्यासी महगाई 
 में, मैं कैसे होली के मिष्ठान 
 बनाऊं पिया 

देखो देश का भविष्य 
सड़कों पे रिक्शा खींच रहा 
सुनहरे सपनो की होली 
हर रोज़ हर दिल में
जलती रहती है 
बोलो,अब कौन सी होली 
मनाऊँ पिया 
मैं कैसे सब कुछ
भूल जाऊं  पिया 

अब दर्द से हाँथ कराह उठे
तुम्हें कैसे रंग लगाऊं पिया 
जब कलम हमारी ही रो पड़ी 
कैसे शब्दों मैं हास्य लाऊं पिया 
बोलो कैसे रंगों मैं डूब जाऊं पिया 





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आकांक्षा सक्सेना 
जिला - औरैया 
मार्च 2013

Thursday, March 7, 2013

होली गीत


                                          होली गीत 


..होली के दिन .श्री कृष्ण जी अपनी प्राणप्रिये राधे से कहते हैं ...देखो क्या कहते हैं ...



                                                     

देखो होली आई प्रिये 
आओ प्रेम का रंग
 लगाओ प्रिये 
हर बात को भूल के 
रंगों की खुशबू में 
खो जाओ प्रिये 
रंगों के शीतल जल से 
जीवन बगिया को 
 महकायें प्रिये 
उस गुलाबी स्पर्श  का 
कब तक करूं 
इंतजार प्रिये 
अब आ भी जाओ 
कहीं से तुम 
मुस्कान की चूड़ियाँ
खनखाती प्रिये 
मेरे हृदय को फाल्गुन
बनाने प्रिये 
रंगों से भरी गगरी लेकर 
आओ अपने श्याम को 
भिगोने प्रिये 
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आकांक्षा सक्सेना 
 सुबह १०:३५ 
७ मार्च २०१३ 

रंग होली के


रंग होली के 

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रंग होली के सबको सुहाने लगते हैं 
अरे ! अस्सी साल के दादा भी 
आज दीवाने लगते हैं 

 रंग होली के देखो गज़ब कर जाते हैं 
 काले गोरे सभी को
 एक कर जाते हैं  

रंग होली के देखो क़यामत करते हैं 
होली के बहाने लोग गालों को 
छूने की हिमाकत करते हैं 

रंग होली के देखो मगन कर जाते हैं 
रंगे फटे -पुराने कपड़े पहने 
सभी झूमते नज़र आते हैं   

रंग होली देखो प्रेम बरसाते हैं 
रंग से भरी एक मुठ्ठी से 
लोग तन -मन में बस जाते हैं 

रंग होली के देखो कितना सिखा जाते हैं 
आपस प्रेम और सम्मान से रहने का 
  शांति सन्देश दे जाते हैं 







आकांक्षा सक्सेना 
जिला - औरैया 
ये पंक्तियाँ लिखने का समय 
साझ ३:४० 
७ मार्च २०१३