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Showing posts from November, 2012
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  समाज आज कल 
(साड़ी )
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समाज के कुछ लोगों की आधुनिक सोच देखो ये क्या 
आधुनिक समय का प्रभाव है आप बतायेगा ...

सास -  बहु ये लो साड़ी, में बनारस गई थी बेटा वहीं से 
तेरे लिए लाई हूँ। देख रंग तो ठीक है ना ।
बहु- वो सब बाद में कितने रूपये की है ।
सास - तुझे पसंद है ना,बेटा 
बहु(कुछ सोचते हुए) - अरे ! होगी 200 रुपये की तभी 
नही बता रही । सासु माँ मैं अभी आती हूँ और एक साड़ी उठा ले आई देखो माँ जी कल मेरी मम्मी ने भिजवाई है
पूरे 2000 रुपये की है,कैसी लगी ।
सास मुस्कुराई -  अच्छी है बेटा  .........................................
अब  सवाल ये उठता की सासू माँ मुस्कुराईं ?
।। क्लेश बचाना है तो मुस्कुराना पड़ता है ||
समय की मांग है 

 आकांक्षा सक्सेना बाबरपुर,औरैया उत्तर प्रदेश 

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ओ ! ज़ालिम 
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करवट मैं तेरी ओ ! ज़ालिम 
पैमाने लाख छलक जाएँ 
तुझे पाने की हसरत में 
दीवाने रोज़ पिघल जाएँ 

       तू आती जब इस महफ़िल में 
       हर दिल के ताले खुल जाएँ 
       जीत भी तू और हार भी तू 
        सब कहते-कहते मर जाएँ 


ज़ालिम इतना तडपती क्यूँ 
दो बोल मोहब्बत के तू बोल 
मेरी कस्ती मझदार पड़ी 
तू माँझी बन के आ जाए 

        तुम मेरे लिए तरसते हो 
        तुम सब मुझ पर मरते हो 
        मेरे एक इशारे पर 
        आपस में लड़ते मरते हो 


इससे आधा ही प्रेम सही 
जो तुम प्रभु जी से कर लो 
मांझी संसार का

हमारा दोस्त

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हमारा दोस्त  ..........................................................................................................................................                                                                                                  


सारी दुनिया की नज़र मैं पशु -पक्षी, पेड़ -पौधे,मानव से भिन्न हैं ।ये बात सभी जानते है पर एक चीज़ है जो सभी मैं सामान है वह है प्रेम,प्रेम से भरी एक नज़र फूलों मैं चमक पैदा कर सकती है और पौधों को हौले -हौले झुमा सकी है और किसी भी पशु-पक्षी को आपका सच्चा मित्र बना सकती है ।
    इसी बात को समझाने के लिए एक सच्ची और प्यारी घटना आप सभी को सुनाना चाहूँगी । दो साल पहले की बात है हम शुक्रवार का माता लक्ष्मी का व्रत -पूजन किया करते थे ।ये पूजन एक तांबे के कलश मैं पानी भर के उसके नीचे लाल रुमाल और उसके ऊपर चावल का एक छोटा ढेर लगाया जाता है उसी ढेर पर तांबे का पानी भरा कलश रखा जाता है उस कलश के ऊपर एक कटोरी रखी जाती है जिसमे एक गुलाब का फूल और कोई एक सोने का गहना या या एक सिक्का रख कर ये पूजा संपन्न की जाती है और पूजा के बाद मैं ये कलश का जल तुलसी पर…
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प्रणाम
     एक बहुमुखी प्रतिभा को
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जिनके लिए कलम भी करती है इंतजार 
          जिनके लिए पन्ने रहते हैं बेक़रार           जिनके लिए पल भी ताकते  हैं आसरा 
          जिनके लिए शब्द भी करते हैं श्रंगार 
          जिनके लिए बन जाती हर कविता रानी 
          जिनके लिए गज़लें भरतीं हैं पानी 
          जिनके  लेखन से सब होते हैरान           जिनकी कलम मैं बसता है संसार 
ऐसे महान लेख़क को मिलता है सभी का प्यार 
इन पक्तियों मैं 
आदरणीय 'जीतेन्द्र देव पाण्डेय विद्यार्थी' जीको
  हमारा सादर प्रणाम 










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मालिक 






वाह रे ! मेरे मालिक लोग तेरी चोखट पर आकर तुझे 


नहीं मांगते .............अजीब दास्ताँ है तेरे भी 
दर्द की ......




आकांक्षा सक्सेना 
बाबरपुर, औरैया 
उत्तर प्रदेश

Blessingsonthenet.com

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बचपन कुरुर हाँथों मैं ..
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उन मासूम निगाहों का भोलापन खो जाता है 
चंद रुपैयों से उनका भाव लगाया जाता है
   बचपन उन बच्चों का नशे की भट्टी मैं झोंका जाता है'
    प्यारी मासूमियत को होटलों मैं परोसा जाता है 

तुम नहीं तो हम नहीं 
लोग कहते मिल जायगें 

   पर उन निर्दोष निगाहों को
    हम कभी भूल ना पाएंगे
सहारे की प्यास जिन्हें 
नाम उनको बेसहारा दिलवाते हैं 

मासूमों की आहें उनकी आँखों मैं' ही सोती हैं 
दिल की हर धड़कन रोटी मैं ही रोती  है 
   सरकार ने घर का आवंटन किया है     गरीब आज भी सड़कों पर करवट ले रहा है 

सरकारी सुविधाएँ गरीबों से आज भी दूर हैं 
आख़िर क्यूँ हम सब मजबूर हैं ?
........ ...हर सरकारी अफसर,अधिकारी ,कर्मचारी  और 
सभी लोग प्रतिदिन सड़कों पर बसों, ट्रेनों,होटलों पर 
गरीब छोटे -छोटे बच्चों को 
काम करते ,भीख मांगते देखते हैं ।क्या हमारी आत्मा 
हमसे एक प्रश्न नही करती की ऐसा क्यों ?
क्या सब ठीक नही किया जा सकता ?
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आओ साथ आयें  ....................
 कोहराम  ना मचाओ 
मशालों को न  बुझाओ 
आस को राखिए ज़िंदा 
विश्वास को द्रढ बनाओ 
तुम ही तो तुम्हारे 
खुद पर रखो भरोसा 
जीवन एक यात्रा है 
आँखें खुली तुम रखना गर सो गए सफ़र में 
तू खुद से ही लूटेगा 
वापस नहीं मिलेगा 
ये सुनहरा वक्त तुझको 
आओ पुकारें खुद को 
आओ जगाएँ खुद को 
आओ ललकारें खुद को 
आओ पहिचाने खुद को 
बनना है सूर्य हमको 
बनना है चाँद हमको 
बनना है पर्वत हमको 
बनना है राम हमको 
बनना है कृष्ण हमको 
बनना है भागीरथ हमको 
बनना है भगत हमको बनना है सुभाष हमको
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हर कोई आज व्यस्त है 

धन ही आज धन है 
आकांक्षा सक्सेना  बाबरपुर ,औरैया  उत्तर प्रदेश
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भ्रष्टाचार हर कोने मैं   मानवता लुटती आज चोड़े मैं ।।
आकांक्षा सक्सेना बाबरपुर, औरैया उत्तर प्रदेश
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घमंड काहे का सनम 
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घमंड  काहे का सनम 


साथ जाने को कुछ भी नहीं

पड़े यहीं सिंघासन सारे 
कभी बैठा करते थे शहंशाह 
घमंड कहे का सनम 
साथ जाने को कुछ भी नहीं 
खंड्हर बने महल 

वीरां पड़ीं वो हवेलियाँ 
कोई नही अपना कहने को 
झूठी हैं सारी पहेलियाँ

घमंड काहे का सनम 


साथ जाने को कुछ भी नहीं 
खुद के अन्दर छिपा है बैठा 
जिसको आत्मा कहते हैं 
जन्मों-जन्मों से जिसको 
समझ न पाए हम 
क्या जानेगें इस दुनिया को 
जब खुद का अपना पता नहीं 
घमंड काहे का सनम 
साथ जाने को कुछ भी नहीं 
प्रेम का नाटक बहुत है 
घर मैं दफनाता कोई नहीं 
जब खुद के घर मैं 
खुद के लिए,
एक कोना तक नहीं 
फिर,घमंड काहे का सनम